Monday, 23 February 2015

मोदी जी की मन की बात

दोस्तों,
प्रधानमंत्री जी द्वारा मन की बात में इस बार सम्बोधन विद्यार्थियों के लिए था। जिसका मुख्य उद्देश्य एक संवाद स्थापित कर विद्यार्थियों के मन से परीक्षा का डर दूर करना रहा। मोदी जी को कोटिशः धन्यवाद् कि इस छोटे किन्तु महत्पूर्ण विषय पर उन्होंने पहल की।

हमारे यहाँ कहावत है कि इंसान का जन्म दो बार होता है। एक बार माँ के गर्भ से और दूसरी बार शिक्षा संस्कार होने पर।
जन्म लेना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और सीखना भी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। आप अगर एक छोटे बच्चे की चेष्ठा  देखेंगे तो इस बात को जान जायेंगे कि उसे घुटना चलना, मन को पह्चानना, बोलना ,हँसना ,रोना कोई नहीं सीखाता। जन्म से स्कूल जाने तक शिशु आसपास के माहौल से ही सीखता है। परंतु सभ्यता की मंजिल की पहली सीढ़ी स्कूल ही होता है जो इंसान को पशु से सुसंस्कृत नागरिक बनाता है। हांलांकि आज सुसंस्कृत की परिभाषा एक बहस का विषय है उस पर न जाते हुए हम अपने मुद्दे पर पुनः लौटते हैं।

तो आज अपने अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा सुसंस्कृत बनाने ही होड मची हुई है। अच्छे से अच्छा स्कूल , ज्यादा से ज्यादा फीस, 5 स्टार स्कूल सुविधाएँ । ये ही मानक है आज अच्छे स्कूल मे दाखिला कराने के। यदि दिल से पूंछा जाये तो बहुत कम लोग ऐसे होंगे जो अच्छे स्कूल की सही परिभाषा बता पाएं। बहुत से लोगो का मानना है कि पढ़ाई तो अपनी जगह है ही स्कूल का मुख्य उद्देश्य साथ पड़ने वालों के साथ भविष्य में बनाये जाने वाले सम्बन्ध हैं। कहने का तात्पर्य है क़ि अच्छे स्कूल की एक परिभाषा यह भी है कि किस तरह के लोगो के बच्चे इसमें पड़ते हैँ।
अब सवाल उठता है अर्थशास्त्र के नियम के अनुसार high investment का मतलब high profit ही होता है। यदि आप अपने बच्चे का भविष्य निर्माण में भारी इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं तो जाहिर है आप को भी high return चाहिए। और यहीं से बच्चे पर pressure पड़ना शुरू हो जाता है। pressure टॉप करने का, pressure हर हाल में बाक़ी सभी लोगो से आगे रहने का। यहाँ समझने की बात यह है कि बच्चा सिर्फ सिखाना जानता है नयी चीजे समझना चाहता है। उसे डॉक्टर, इंजीनियर और career जैसे शब्द पता भी नहीं होते। ये सभी हमारी कुंठाएं और महत्वाकांक्षाएं ही होती हैं जो हम उन पर लाद देते हैं और बच्चे का उन्मुक्त विकास रोक देते हैं।
मुझे याद है मेरी बेटी जो की 5 साल की है उसके स्कूल में डांस प्रतियोगिता थी। वो मेरे पास आई और बोली पापा मुझे fisrt आना है। मैंने उसे समझाया बेटा तुम्हे फर्स्ट नहीं आना है तुम्हे तो सबसे अच्छा डांस करना है बस बाक़ी सब भूल जाओ। मेरी बेटी उस compitition मैं 2nd आ कर भी बहुत खुश थी। क्योंकि फर्स्ट आने का कोई pressure उस पर नहीं था।

ऊपर वाला बहुत कारसाज है। उसे हर मानव निर्माण में विविधता रखनी होती है। यह बात बहुत जरूरी है समझना कि हर किसी में एक विशिष्ठ गुण होता है और उसे ही उभारना जरूरी होता है। अतः हमें अपने आप को और बच्चों  को यह  समझाना पड़ेगा कि प्रतियोगिताओ को ,जिसमे परीक्षाएं भी शामिल है को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये बिना स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का रूप दें ताकि बच्चों मैं कुंठा घर न कर सके और बास्तव में सभ्य, जिम्मेदार  और सुसंस्कृत नागरिक बन सके। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि कुंठा का चरम रूप आत्महत्या या प्रतिहिंसा के रूप मे दिखाई देता है।

एक कवि इन पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।
हम उन्मुक्त गगन के पंछी, पिंजरबद्ध न गा पाएंगे।
कनक तीलियों से टकराकर,पंख हमारे टूट जायेंगे।

Saturday, 14 February 2015

AIB knockout

AIB का आल इंडिया बकचोद शो आज बहस का एक गरमा गर्म मुद्दा बना हुआ है। एक और इसको सही ठहराने वाले समर्थको की जमात है तो दूसरी और इसके विरोधियों का समूह। समर्थक इसकी अश्लील विषयवस्तु को बोलने की आजादी का हवाला देते हुए सही ठहराने की कोशिश कर रहे है वही विरोधी ऐसे सीधा सीधा भारतीय मूल्यों पर कुठाराघात मान रहे है। आईये पाहिले समझते हैं ये विवाद है क्या ।
AIB एक रोस्ट शो है जिसे dec-2014 मैं मुम्बई के एक स्टेडियम मे आयोजित किया गया जिसमे लगभग 4000 लोग मौजूद थे बॉलीवुड की जानीमानी हस्तियों के साथ। रोस्टर की भूमिका मैं करण जौहर अर्जुन कपूर और रणवीर सिंह थे। इस शो में हास्य के नाम पर इस तरह की गन्दी भाषा का प्रयोग किया गया क़ि मर्यादा की सारी हदें तोड़ दी गयी। यही मुख्यता बहस का मुद्दा है। अश्लील फब्तियां कसने में महिलाओं को भी नहीं छोड़ा गया और शब्दावली कुछ ऐसी थी की चाह कर भी कुछ बानगी नहीं लिख पा रहा।
वस्तुतः रोस्ट एक ऐसा शो जिसमे एक guest को बुलाया जाता है और उस पर अन्य श्रोताओ की उपस्तिथि में व्यंग्य किये जाते है। यहाँ व्यंग्य का अर्थ अश्लील मजाक से है जिसमे उसकी माँ और बहन को भी नहीं छोड़ा जाता। इसमें रोस्टर guest होता है और संचालक रोस्ट मास्टर कहलाते है। अंत मैं गेस्ट का सम्मान किया जाता है। यह एक तरह से insult comedy है जो बहुत ही अश्लील होती है। इस तरह के ग्रुप में यह सम्मान देने का तरीका है।
रोस्ट की शुरुआत एक परुम्परा के रूप में न्यूयॉर्क के फरारी क्लब मैं हुई थी लगभग 1920 में और इसने लोकप्रियता पायी 60 और 70 के दशक मे।

AIB रोस्ट भी अमेरिका के comedy central तर्ज पर बना रोस्ट ग्रुप है। इसके पहले ही शो इतना गन्दा रहा क़ि इसके खिलाफ जंग छिड़ गयी। AIB national shame ट्वीटर ग्रुप इसका उदहारण है। मजे की बात यह है कि इस् शो का nature जानते हुए भी लगभग 4000 rs का टिकिट ख़रीद कर बड़ी संख्या मे श्रोता उपस्थित थे। जिनमे महिलाओ की भी बड़ी संख्या थी। सोनाक्षी सिन्हा दीपका पादुकोण आलिया भट्ट कुछ उदहारण है जिन्होंने न सिर्फ शो को बहुत अच्छा बताया बल्कि सपोर्ट भी किया।

इस शो को किसी टीवी नेटवर्क पर प्रसारित नहीं किया गया वरन एक adult वार्निंग डाल कर yutube पर और ABI की आधिकारिक वेबसाइट पर डाल दिया गया और वेब एपिसोड नाम दिया गया। इसे सिर्फ 7 दिन मैं 8 लाख लोगो ने देखा और और इसके क्लिप्स सोशल मीडिया पर virul हो गए।

अब सवाल उठता है कि यह तो सच है क़ि शो निहायत ही अश्लील था पर किस आधार पर आप इन लोगो को गलत ठहरा सकते हो।

AIB टीम ने इसे किसी टीवी नेटवर्क पर इसे प्रसारित नहीं किया। web पर भी एडल्ट वार्निंग के साथ डाला गया। अब सिर्फ दो तरह के लोग जिम्मेदार हुए पहले वो जो जानते बूझते हुये भी 4000 का टिकिट ख़रीद कर इसे देखने गए और दूसरे वो जिन लोगो ने इंटरनेट पर इसके लिंक पर क्लिक किया। इसकी डाउनलोड की संख्या भी इस बात का प्रमाण है क़ि इस तरह के शो की कितनी डिमांड है हमारे समाज में जहाँ 65 % आबादी युवा है। और फिर हम आम बोलचाल की भाषा में भी तो गालीगलौच का इस्तेमाल करते ही हैं तो फिर बहस क्यों । इंटरनेट पर तो तमाम तरह की अच्छी और गन्दी चीजे उप्लब्ध है तो इस पर हंगामा क्यों ,अगर आप नहीं देखना चाहते तो कोई आपको मजबूर तो कर नहीं रहा।

दिल की बात:
तमाम तरह के तर्क देने के बाद  भी इस तरह की चीजो को दिल से सही नहीं ठहराया जा सकता। हास्य एक बहुत ही कठिन कला है और बरसो लग जाते हैं इसमें माहिर होने में। जल्दी लोकप्रियता पाने का आसान तरीका का लोगो की insult करना और हँसन। हास और उपहास में बहुत फर्क होता है। यूटुब पर पर शो के क्लिप डालना और फिर पुनः वापिस ले लेना वास्तव मे जनता रुख जानने का प्रयास ही था। इन लोगो को मालूम था कि इससे एक नयी बहस की शुरुआत होगी और हवा का रुख पता लग जायेगा। अगली बार फिर से ऐसा दोहराया जायेगा और धीरे धीरे सब सामान्य हो जायेगा और ऐसा होता भी आया है। आपको याद होगा केंटुकी फ्राइड चिकन का शुरू शुरू में कितना विरोध हुआ था और आज सब व्यवहारिक है। यह गलत इसलिए है कि आपको कोई अधिकार नहीं है कि आप सिर्फ हास्य के नाम पर समाज, धर्म और जीवन मूल्यों पर हमला करे और विरोध होने पर यूटुब से एपिसोड वापिस ले कर कर्त्तव्य की एतिश्री कर लें। जो क्षति हो चुकी है वो तो हमेशा अपूर्णीय है ही। इस तरह के शो मे जानीमानी हस्तियों की उपस्तिथि निन्दनीय है ऐसा करने का उद्देश्य इस तरह के शो को जनता तक पहुँचाना ही है। इन हस्तियों को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। हाई स्पीड इंटरनेट के चलते हुए आने वाले दिनों में इस तरह की और भी चीजे आपके सामने आएँगी और आप बेबस होंगे।
जल्द मिलेंगे नए सब्जेक्ट के साथ
योगेश

Tuesday, 10 February 2015

kejariwal vs narendra modi

केजरीवाल की प्रचंड जीत के बाद सवाल उठता है क़ि काँग्रेस की हार तो पक्की थी पर भाजपा के साथ ऐसा क्या हुआ।

एक प्रबुद्ध नागरिक दिनेश जी का कहना है।

ये केजरीवाल की जीत नही।
मोदी के विरोधियो की सामूहिक जीत है।जिसमे मिडिया से लेकर देश के सभी धुरंधर शामिल है।
 मुसलमानो का पूरा वोट बिना बटे आप को मिला
ना है ये केजरीवाल की जीत नही।
मोदी के विरोधियो की सामूहिक जीत है।जिसमे मिडिया से लेकर देश के सभी धुरंधर शामिल है।
मुसलमानो का पूरा वोट बिना बटे आप को मिला

पर मदन चतुर्वेदी के अनुसार क्या यह सत्य नहीं है

आप को मुसलमानो ने मिलकर बोट दिया ये तो वहां दीवार पर लिखा दिख रहा था पर हिंदुओं ने क्यू नहीं दिया और ये क्या बी जे पी की हार है क्या ये हार नहीं है ये तो कुचला है जिसके नीचे कुछ नहीं बचा और जब तक दिल्ली रहेगी ये एक रिकार्ड रहेगा 70 मे 67 सीट
अकल्पनीय
मोदी हरयाणा मे गुजरात और हरियाणा मे क़त्ल खाने की फ़ाइल पर जब साइन कर रहे थे तब केजरीवाल घर घर ये भरोसा दे रहा था की नीच और भ्रष्ट पुलिश से हम आपको सुरछा देंगे
दिल्‍ली की संपूर्ण भाजपा ने हारने के लिए चुनाव लड़ा। पिछली बार की तरह 500-1000 वोटों से नहीं, बल्कि 10 हजार से लेकर 50 हजार वोटों के अंतर से हारे हैं भाजपाई...
देश के भावनाप्रबल राष्ट्रवादी लोगों को क्या मोदीजी जुमले के तौर पर सब्जबाग दिखाते रहे,वैसे भी उनका हिंदुत्व के मुद्दे से कन्नी काटना,धारा ३७० पर धीमी कार्यवाही,राममंदिर सहित गौहत्या पाबन्दी इत्यादि मुद्दों पर यु टर्न ने लोगों को संदेह में दाल दिया था और देश के करोड़ों लोगों ने जहाँ रेल लाइन नहीं देखि उस देश में सिर्फ अहमदाबाद से मुंबई तक बुलेट ट्रैन चलाने के लिए जो ललक वे दिखाते रहे,जापान से लेकर चीन से लाखों करोड़ों के समझोता किया क्या उसकी भरपाई सिर्फ गुजरात और महाराष्ट्र के लोग करेंगे या पुरे देश के लोगों की जेब से ये उधार की ट्रैन का कर्जा चुकाया जाएगा ऐसे अनेक प्रश्न लोगों के जहन में चिंता और संदेह पैदा करते हैं!अंधभक्त लिखते हैं की मोदीजी २० घंटे काम करते हैं,ठीक है मानते हैं करते होंगे,यानी एक दिन में अढ़ाई दिन का काम वे कर रहे हैं,तो फिर उनको प्रधानमंत्री बने ९ महीने हो गए यानि ओरों के लिए २७ महीने हो गए,तो फिर कहाँ है,कुछ दिख रहा है लोगों को २७ महीने जैसा काम?हर मामले में अभी तक तो मोदीजी और अमित शाहजी फेल होते नजर आ रहे हैं,सिर्फ चुनाव,सत्ता,और सदस्यता अभियान सहित स्वछभारत अभियान भी नौटंकी सी लग रही है लोगों को!मनमोहन सिंह के समय बॉर्डर पर ऐसा क्या होता था जो अब नहीं हो रहा,इसके साथ ही अभी जो न्यूक्लियर डील में भी अमरीकी सरतों पर सहमति हुवी और अमरीका पहुंचते ही मोदीजी के देश पर ही अंगुली उठा दी,जबकि ओबामा की जवांई जैसी खातिर हुवी थी!दोस्तों कॉंग्रेस्स शासन में तो फिर भी ये साधु संत और साध्वी खुल कर हिंदुत्व पर भाषण मार देते थे,किन्तु अब जिनको हम हिन्दुओं का शेर बनाकर सत्ता दी है,उसके ही शासन में साधुसंत या साध्वी मुसलमानों का विरोध करने से,बच्चे पैदा करने की बात करने से बिकाऊ मिडिया के विवादित बयान बताते ही खुद भी माफ़ी मांग लेते हैं और साधुसन्तों एवं साध्वी से भी माफ़ी मंगवाते हैं!कुछ भी हो सत्ता पर बना रहना है और तहत बात से रहना है यही सन्देश तो अभी तक लोगों में गया है दोस्तों!
दिल की बात :
मोदी जी हमें आपसे बहुत उम्मीदे है आशा है क़ि आप इस पर विचार करेंगे। आप का जैसा नेता बहुत वर्षो बाद ही हमें मिलता है और हम चाहते है कि इससे पाहिले आपकी बुराई करना लोगो का शौक बन जाये कृपया कुछ कीजिये।

Delhi election : kejariwal reply

....और केजरीवाल को दिल्ली में प्रचंड बहुमत मिल ही गया। तमाम मीडिया और राजनितिक विश्लेषकों की अटकलों को दरकिनार करते हुये दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को जीत का सेहरा पहना दिया। अगर गौर से देखा जाये तो यह भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव है। बदलाव सोच का, बदलाव आम आदमी को भी नेता समझने का और बदलाव धन-बल के आगे जनता का विकास और मूलभूत आवश्यकताओ के मुद्दों को तरजीह देना।
किसको पता था क़ि मोदी का अश्वमेध का विजय रथ ठीक उनकी नाक के नीचे रोक लिया जायेगा। और वो भी दिल्ली की जनता के द्वारा।
बदलाव की नींव तो अण्णा आंदोलन के समय ही पड़ गयी थी जब टीम अण्णा ने आम आदमियों को यह समझाया कि आम जनता को भी सीधे सवाल।पूंछने का हक़ है। कभी कभी मुझे लगता है जैसे सवाल पूंछने वाले भी कहीं न कहीं विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते है और सत्ता के समीप ही खड़े नजर आते है। चाहे वो वातानुकूलित राजनीति करने वाले सांसद हो या टी आर पी के आधार पर चलने वाले बड़े मीडिया संस्थान।

बड़ा सुखद होता है बड़े नेताओ को आम आदमी की तरह से व्यव्हार करते देखना। शायद इसी जगह केजरीवाल बाजी मार ले गए। अभी दिल्ली से आये एक परिचित ने बताया कि दिल्ली मैं हजारों की संख्या में रेहड़ी वाले और फूटपाथ पर सामान बेचने वालें हैं और इनसे पुलिस वालों की हफ्ता वसूली एक आम रिवाज की तरह है। उनका कहना है कि पिछली केजरीवाल की सरकार के समय लगभग 2 महीने उनसे पैसे वसूलने की हिम्मत किसी की नहीं पड़ी।  यह सिर्फ एक उदाहरण है ऐसे कई किस्से और भी हैँ।

एक और बात और यह क़ि दिल्ली वालों ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को नकार दिया है महत्वपूर्ण है
इसका दूरगामी प्रभाव भारतीय राजनीति में निश्चित पड़ेगा। अन्य राजनीतिक पार्टियों को भी इससे सबक सीखने की जरूरत है कि अब चुनाव विकास के मुद्दों पर लड़े जाएँ तो अच्छे नतीजे आ सकते हैँ नरेंद्र मोदी के सामने होने के बावजूद भी। दिल्ली में आप की जीत नरेंद्र मोदी के लिए भी आत्ममंथन का विषय है क़ि सिर्फ हवाबाजी ही नहीं कुछ ठोस करना होगा। किरण बेदी को बिना बात ही बलि का बकरा बनाया गया और उनकी खुद की भी छबि इससे ख़राब हुई ।काँग्रेस को तो आत्ममंथन से ज्यादा आत्मा परिवर्तन की आवशयकता है जिस बेफिक्री और दम्भ के साथ इन्होंने सरकार चलाई थी उसका करारा जवाब इन्हें मिल गया है। इनके नेताओ को अब वातानुकूलित ऑफिस छोड़ के सड़क पर उतरना पड़ेगा और जनता से जुड़ना पड़ेगा।

केजरीवाल को बधाई ।  कुरुक्षेत्र अब सामने है। बड़ी जीत ,बड़ी अपेक्षाएं ,बड़ी जिम्मेदारी।
और भाजपा और कांग्रेस के लिए नसीहत कि चुनाव मुलभुत मुद्दों पर भी लड़े जा सकतें हैं।

 बदलाव के सूर्य को नमस्कार इन पंक्तियों के साथ:

ये रौशनी के इरादों की बात थी, वरना
'हवा' के सामने नन्हा सा इक दिया क्या है
 "देखो तो इक पहाड़ से कंकड़ उलझ गया.
जोश ओ जूनून से यह दिलावर उलझ गया.
हिम्मत को उसकी आप भी अब दाद दीजिये.
लाखों के सूट बूट से मफलर उलझ गया."

Sunday, 8 February 2015

Nari shakti

स्‍वामी रामकृष्‍ण परमहंस और मां शारदा

राम कृष्‍ण अपनी पत्‍नी को मां बोलते थे। और यूं नहीं कि बाद में कहने लगे थे। रामकृष्‍ण जब चौदह साल के थे, तब उनको पहली समाधि हुई। आ रहे थे अपने खेत से वापस। झाल के पास से गांव में से गुजरते थे। सुंदर गांव की झील, सांझ का समय, सूरज का डूबना, बस डूबा-डूबा। सूरज की डूबती हुई किरणों ने, आकाश में फैली छोटी-छोटी बदलियों पर बड़े रंग फैला रखे है। वर्षा के दिन करीब आ रहे है। काली बदलियां भी छा गई है। घनघोर, जल्‍दी रामकृष्‍ण लोट रहे है। तभी बगुलों की एक पंक्‍ति झील से उड़ी और काली बदलियों को पार करती हुई निकल गई। काली बदलियों से सफेद बगुलों की पंक्‍ति का निकल जाना, जैसे बिजली कौंध गई। यह सौंदर्य का ऐसा क्षण था कि रामकृष्‍ण वहीं गर पड़े। घर उन्‍हें लोग बेहोशी में लाए। लोग समझे बेहोशी है, वह थी मस्‍ती। बामुशिकल से वे होश में लाए जा सके।

उनसे पूछा, क्‍या हुआ?

उन्‍होंने कहा, अद्भुत हुआ, बड़ा आनंद हुआ। बार-बार ऐसा ही होना चाहिए। अब मुझे होश में रहने की—जिसको तुम होश कहते हो—उसमें रहने की कोई इच्‍छा नहीं है।

गांव के लोगों ने, घर के लोगों ने सोचा कि लड़का बिगड़ा जा रहा है। यह तो मामला खराब है। यह ऐसे भी साधु-संग करता था। जाता था सुनने सत्‍संग। तब तक भी ठीक था; अब यह समाधि में भी जाने लगा। अब यह बेहोश हो-हो कर गिरने लगा। यह मामला बिगड़ा जा रहा है। यह हाथ से गया। गदाधर उनका नाम था। जो घर के लोगों का आम सोचने का ढंग होता है, उन्‍होंने कहा, जल्‍दी से इसके विवाह वगैरह का इंतजाम करो, हथकड़ी-बेड़ी डाल दो, तो यह रास्‍ते पर आ जाएगा। सो रामकृष्‍ण से पूछा कि बेटा, विवाह करोगे?

राम कृष्‍ण ने कहा,करेंगे।

घर के लोग थोड़े चौके, उन्‍होंने सोचा था यह इनकार करेगा।

उन्‍होंने कहा जरूर करेंगे, किससे करना है?

घर के लोगों ने कहा, अरे, हम तो सोचते थे तू सत्‍संगी हो गया है, समाधि लगने लगी है, और गांव में बड़ी चर्चा है कि तू ज्ञानी हो गया है। इस लिए तो हम तेरा विवाह कर रहे थे। और तू है कि कहता है करेंगे, किससे करना है? तू इतनी जल्‍दी में है।

पास में ही गांव में एक लड़की खोजी गई। रामकृष्‍ण को दिखाने ले गए। रामकृष्‍ण को जब लड़की मिठाई परोसने आई। बंगाल, तो वहां संदेश परोसा होगा। जब संदेश उसने रामकृष्‍ण की थाली में रखे, रामकृष्‍ण ने देखा। शारदा उसका नाम था। खीसे में जितने मां ने रूपये रख दिए थे। सब निकाल कर उसके पैरों पर चढ़ा दिए, और कहा कि तू तो मेरी मां है। शादी हो गई।

लोगों ने कहा, तू पागल है रे; पहले तो शादी करने की इतनी जल्‍दी कि और अब पत्‍नी को मां कह रहा है। कुछ अक्ल है तुझे, यो बौरा गया है। बेअक्‍ल हो गया है।

मगर उसने कहा कि यह तो मेरी मां है, शादी होगी, मगर यह मेरी मां ही रहेगी।

शादी भी हो गई। शादी से इंकार भी नहीं किया। इसको मैं खूबी कहता हूं। रामकृष्‍ण की। इसलिए रामकृष्‍ण से मुझे प्रेम है। एक लगाव है। यह आदमी अदभुत है। शादी करने में इनकार ही नहीं किया। नोट देख कर आंखे बंध करने वाले विनोबा जी नहीं है। अरे शादी से भी नहीं भागा। मगर शादी भी किस मस्‍ती से की। कहा कि मेरी मां है। और फिर जीवन भर मां ही माना। मां ही कहते थे वे शारदा को। और हर वर्ष जब बंगाल में काली की पूजा होती, तो वे काली की पूजा तो करते थे, मगर जब काली की पूजा का दिन आता है, उस दिन वे शारदा की पूजा करते थे
साभार मदन चतुर्वेदी