दोस्तों,
प्रधानमंत्री जी द्वारा मन की बात में इस बार सम्बोधन विद्यार्थियों के लिए था। जिसका मुख्य उद्देश्य एक संवाद स्थापित कर विद्यार्थियों के मन से परीक्षा का डर दूर करना रहा। मोदी जी को कोटिशः धन्यवाद् कि इस छोटे किन्तु महत्पूर्ण विषय पर उन्होंने पहल की।
हमारे यहाँ कहावत है कि इंसान का जन्म दो बार होता है। एक बार माँ के गर्भ से और दूसरी बार शिक्षा संस्कार होने पर।
जन्म लेना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और सीखना भी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। आप अगर एक छोटे बच्चे की चेष्ठा देखेंगे तो इस बात को जान जायेंगे कि उसे घुटना चलना, मन को पह्चानना, बोलना ,हँसना ,रोना कोई नहीं सीखाता। जन्म से स्कूल जाने तक शिशु आसपास के माहौल से ही सीखता है। परंतु सभ्यता की मंजिल की पहली सीढ़ी स्कूल ही होता है जो इंसान को पशु से सुसंस्कृत नागरिक बनाता है। हांलांकि आज सुसंस्कृत की परिभाषा एक बहस का विषय है उस पर न जाते हुए हम अपने मुद्दे पर पुनः लौटते हैं।
तो आज अपने अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा सुसंस्कृत बनाने ही होड मची हुई है। अच्छे से अच्छा स्कूल , ज्यादा से ज्यादा फीस, 5 स्टार स्कूल सुविधाएँ । ये ही मानक है आज अच्छे स्कूल मे दाखिला कराने के। यदि दिल से पूंछा जाये तो बहुत कम लोग ऐसे होंगे जो अच्छे स्कूल की सही परिभाषा बता पाएं। बहुत से लोगो का मानना है कि पढ़ाई तो अपनी जगह है ही स्कूल का मुख्य उद्देश्य साथ पड़ने वालों के साथ भविष्य में बनाये जाने वाले सम्बन्ध हैं। कहने का तात्पर्य है क़ि अच्छे स्कूल की एक परिभाषा यह भी है कि किस तरह के लोगो के बच्चे इसमें पड़ते हैँ।
अब सवाल उठता है अर्थशास्त्र के नियम के अनुसार high investment का मतलब high profit ही होता है। यदि आप अपने बच्चे का भविष्य निर्माण में भारी इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं तो जाहिर है आप को भी high return चाहिए। और यहीं से बच्चे पर pressure पड़ना शुरू हो जाता है। pressure टॉप करने का, pressure हर हाल में बाक़ी सभी लोगो से आगे रहने का। यहाँ समझने की बात यह है कि बच्चा सिर्फ सिखाना जानता है नयी चीजे समझना चाहता है। उसे डॉक्टर, इंजीनियर और career जैसे शब्द पता भी नहीं होते। ये सभी हमारी कुंठाएं और महत्वाकांक्षाएं ही होती हैं जो हम उन पर लाद देते हैं और बच्चे का उन्मुक्त विकास रोक देते हैं।
मुझे याद है मेरी बेटी जो की 5 साल की है उसके स्कूल में डांस प्रतियोगिता थी। वो मेरे पास आई और बोली पापा मुझे fisrt आना है। मैंने उसे समझाया बेटा तुम्हे फर्स्ट नहीं आना है तुम्हे तो सबसे अच्छा डांस करना है बस बाक़ी सब भूल जाओ। मेरी बेटी उस compitition मैं 2nd आ कर भी बहुत खुश थी। क्योंकि फर्स्ट आने का कोई pressure उस पर नहीं था।
ऊपर वाला बहुत कारसाज है। उसे हर मानव निर्माण में विविधता रखनी होती है। यह बात बहुत जरूरी है समझना कि हर किसी में एक विशिष्ठ गुण होता है और उसे ही उभारना जरूरी होता है। अतः हमें अपने आप को और बच्चों को यह समझाना पड़ेगा कि प्रतियोगिताओ को ,जिसमे परीक्षाएं भी शामिल है को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये बिना स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का रूप दें ताकि बच्चों मैं कुंठा घर न कर सके और बास्तव में सभ्य, जिम्मेदार और सुसंस्कृत नागरिक बन सके। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि कुंठा का चरम रूप आत्महत्या या प्रतिहिंसा के रूप मे दिखाई देता है।
एक कवि इन पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।
हम उन्मुक्त गगन के पंछी, पिंजरबद्ध न गा पाएंगे।
कनक तीलियों से टकराकर,पंख हमारे टूट जायेंगे।
प्रधानमंत्री जी द्वारा मन की बात में इस बार सम्बोधन विद्यार्थियों के लिए था। जिसका मुख्य उद्देश्य एक संवाद स्थापित कर विद्यार्थियों के मन से परीक्षा का डर दूर करना रहा। मोदी जी को कोटिशः धन्यवाद् कि इस छोटे किन्तु महत्पूर्ण विषय पर उन्होंने पहल की।
हमारे यहाँ कहावत है कि इंसान का जन्म दो बार होता है। एक बार माँ के गर्भ से और दूसरी बार शिक्षा संस्कार होने पर।
जन्म लेना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और सीखना भी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। आप अगर एक छोटे बच्चे की चेष्ठा देखेंगे तो इस बात को जान जायेंगे कि उसे घुटना चलना, मन को पह्चानना, बोलना ,हँसना ,रोना कोई नहीं सीखाता। जन्म से स्कूल जाने तक शिशु आसपास के माहौल से ही सीखता है। परंतु सभ्यता की मंजिल की पहली सीढ़ी स्कूल ही होता है जो इंसान को पशु से सुसंस्कृत नागरिक बनाता है। हांलांकि आज सुसंस्कृत की परिभाषा एक बहस का विषय है उस पर न जाते हुए हम अपने मुद्दे पर पुनः लौटते हैं।
तो आज अपने अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा सुसंस्कृत बनाने ही होड मची हुई है। अच्छे से अच्छा स्कूल , ज्यादा से ज्यादा फीस, 5 स्टार स्कूल सुविधाएँ । ये ही मानक है आज अच्छे स्कूल मे दाखिला कराने के। यदि दिल से पूंछा जाये तो बहुत कम लोग ऐसे होंगे जो अच्छे स्कूल की सही परिभाषा बता पाएं। बहुत से लोगो का मानना है कि पढ़ाई तो अपनी जगह है ही स्कूल का मुख्य उद्देश्य साथ पड़ने वालों के साथ भविष्य में बनाये जाने वाले सम्बन्ध हैं। कहने का तात्पर्य है क़ि अच्छे स्कूल की एक परिभाषा यह भी है कि किस तरह के लोगो के बच्चे इसमें पड़ते हैँ।
अब सवाल उठता है अर्थशास्त्र के नियम के अनुसार high investment का मतलब high profit ही होता है। यदि आप अपने बच्चे का भविष्य निर्माण में भारी इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं तो जाहिर है आप को भी high return चाहिए। और यहीं से बच्चे पर pressure पड़ना शुरू हो जाता है। pressure टॉप करने का, pressure हर हाल में बाक़ी सभी लोगो से आगे रहने का। यहाँ समझने की बात यह है कि बच्चा सिर्फ सिखाना जानता है नयी चीजे समझना चाहता है। उसे डॉक्टर, इंजीनियर और career जैसे शब्द पता भी नहीं होते। ये सभी हमारी कुंठाएं और महत्वाकांक्षाएं ही होती हैं जो हम उन पर लाद देते हैं और बच्चे का उन्मुक्त विकास रोक देते हैं।
मुझे याद है मेरी बेटी जो की 5 साल की है उसके स्कूल में डांस प्रतियोगिता थी। वो मेरे पास आई और बोली पापा मुझे fisrt आना है। मैंने उसे समझाया बेटा तुम्हे फर्स्ट नहीं आना है तुम्हे तो सबसे अच्छा डांस करना है बस बाक़ी सब भूल जाओ। मेरी बेटी उस compitition मैं 2nd आ कर भी बहुत खुश थी। क्योंकि फर्स्ट आने का कोई pressure उस पर नहीं था।
ऊपर वाला बहुत कारसाज है। उसे हर मानव निर्माण में विविधता रखनी होती है। यह बात बहुत जरूरी है समझना कि हर किसी में एक विशिष्ठ गुण होता है और उसे ही उभारना जरूरी होता है। अतः हमें अपने आप को और बच्चों को यह समझाना पड़ेगा कि प्रतियोगिताओ को ,जिसमे परीक्षाएं भी शामिल है को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये बिना स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का रूप दें ताकि बच्चों मैं कुंठा घर न कर सके और बास्तव में सभ्य, जिम्मेदार और सुसंस्कृत नागरिक बन सके। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि कुंठा का चरम रूप आत्महत्या या प्रतिहिंसा के रूप मे दिखाई देता है।
एक कवि इन पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।
हम उन्मुक्त गगन के पंछी, पिंजरबद्ध न गा पाएंगे।
कनक तीलियों से टकराकर,पंख हमारे टूट जायेंगे।