Saturday, 18 April 2015

भगवान न होता तो क्या होता

भगवान् न होता तो क्या होता। यह सवाल शनिवार से ही मन को विडोलित कर रहा है। सवाल मैं एक भोलापन है साथ ही साथ एक दृढता भी। इसके साथ ही एक सवाल और आया कि मेरा भगवान् और तेरा भगवान् अलग अलग । मैं तो सोमवार का व्रत रखूँगा । मैं बुधवार का। और कोई ऐसा भी है जो व्रत को।मानेगा ही नहीं फिर भी खुश और प्रसन्न।
सबसे पहिले पाहिले सवाल पर।भेजमारी करते हैं। कि भगवान् नहीं होता तो क्या होता।

हमारे पूर्व पुरुष बहुत ही भोले और प्रकृति के साथ रहने वाले जीव थे। वो शोध् नहीं कर सकते थे और खाने पीने जीवन यापन के लिए विज्ञानं नहीं वरन प्रकृति पर पूर्णतया आश्रित थे। याद रहे मैं पाषाण काल की बात कर रहा हूँ। अब सर्वप्रथम इनका परिचय प्राकृतिक शक्तियों से ही हुआ। कुछ से यह आश्चयचकित हुए। कुछ से भयभीत तो कुछ से आशवस्त। उसे सभी के सामने नतमस्तक होना ही था। क्योंकि यहाँ शक्ति क़ी कोई समानता थी ही नहीं। अब यहीं से भगवान् का निर्माण हुआ जिसका परिष्करण लगातार जारी है। वर्तमान मैं भी।
हाँ तो हम बात कर रहे थे कि प्राकृतिक शक्तियों मैं वह सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। आकाश और पृथ्वी से। उसमे उन्होंने माता पिता की छबि देखी और होना भी चाहिए ,पालनकर्ता के लिए आभारी तो होना ही होगा। फिर जब कुछ के कारण उसे समझ आने लगे तो सुक्ष्म ज्ञान की और वह बड़ा और सूर्य सविता मित्र वरुण अग्नि इंद्रा सोम उषा अदिति आदि का निर्माण किया और भिन्न भिन्न कारणों से उनकी पूजा की। सरल ह्रदय पूर्वजो की कल्पना मैं भी मानव ही रहा तो उनका चित्रण भी मानव रूप मैं ही किया गया। समय के साथ देवताओं की संख्या बढ़ती चली गयी क्योंकि शोध तो सभी अपने अपने तरीके से कर ही रहे थे।
अब प्रश्न उठा कि जैसे हमारे यहाँ एक राजा होता है वैसे ही इनका भी सर्वशक्तिमान रजा ढूँढो। उपनिषदों की कहानिया भरी पड़ी हैं इस चर्चा से।
इसके लिए सबसे पहिले बरुण को देवाधिदेव बनाया गया। फिर सोम की और अग्नि की स्थापना की गयी। वेदों के समय आर्यों को उग्र और चालाक नेता के आवश्यकता महसूस हुई क्योंकि यह असुरों से युद्ध का समय था। तो इंद्र को देवाधिदेव मन गया।परंतु  पूर्वजों की जिज्ञासा इंद्र पर ही खत्म नहीं हुई और ब्रम्हांड को नियत करने वाली परम सत्ता तक पहुंचने का प्रयास किया गया। ऋग्वेद के अनुसार।
एकम् सदविप्रा: बहुदा वदन्ति। अगनि यम् मातृष्वनमाहु:
अर्थार्त सत्य एक ही है विद्वान् उसे अग्नि यौम इंद्र आदि अलग अलग नामो से पुकारते हैं। इस प्रकार ऋग्वेद काल तक हमारे पूर्वज बहुदेवाद से ले होकर एकेश्वर वाद की पराकाष्ठा तक पहुँच गए थे। और यही भागवान था। मतलब भागवान एक class है और देवता अलग अलग properties के साथ उसका inheritance।
ये तो हुआ भगवान का स्थापना और मनुष्य के दिमाग के परिष्कृत होने का सफ़र। पर हमारा मूल प्रश्न अभी भी शेष है। अगर ये न होता तो क्या होता।
यदि गौर से देखें तो भय आश्चर्य और आश्वासन ही ढूंढने ही हम भगवान् के पास जाते हैँ और यदि ये आलुम्बन न हो तो जीवन जिन बहुत कठिन हो जाये। हम बचपन से ही सामाजिक हैं और कमजोर भी शारीरिक और मानसिक रूप से भी। जीवन की कुछ घटनाएँ आज भी हमारी समझ से बाहर हैं । जैसे कि मृत्यु और जीवन। समान परिस्थियों के होते हुए भी एक को आशातीत सफलता और दूसरे का संघर्ष। हमारे पूर्वज बहुत ही मनोवैज्ञानिक थे उन्होंने सोचा यदि इसका बोझ अगर आदमी खुद ही उठता फिरेगा तो जी ही नहीं पायेगा। यहाँ सब भगवान् पर छोड़ दिया जाता है। जैसे हम पिताजी के रहते आशवस्त रहते है ठीक वैसे ही।
आज भी जो जो चीजे हमारी समझ मैं आती जा रही है वो भगवान् के अधिकार क्षेत्र से निकाली जा चुकी है। अब कोई मानसून भगवान् खींच कर नहीं लाते। पृथ्वी को घुमाने और सूर्य को घुमाने का काम उन्होंने ओउटसोर्से कर दिया है। पर जहाँ मानव मन का सवाल है यह बहुत जटिल है और यदि यहाँ भावना करुणा सृंगार की अनुभूति है तो निश्चित ही सिर्फ साइंस के यथार्तवाद से काम नहीं चलेगा। किसी असीम शक्ति के अंश होने का अहसास बहुत जरूरी है।
यहाँ यह समझना बहुत जरूरी है कि भगवान् का निर्माण मनुष्य ने अपने अनुत्तरित प्रश्नो के जवाब के रूप मैं ही किया है। और यह प्रश्र काल और जाति के अनुसार बदलते रहते हैं। यही कारण है कि मेरा भागवान तेरे भगवन से अलग है क्योंकि मेरा देखने का नजरिया अलग है। अगर मैं और तू देखने में और व्यवहार करने में अलग हैं तो मेरा भवान् भी अलग ही होना चाहिए। यहीं से अलग अलग पूजा पधातियों का विकास शुरू हो जाता है। मेरा मंगलवार है तेरा बुधवार है। मैँ खिचड़ी का भोग लगाउँगा तू मांस खता है तू मांस का लगा। आदि आदि।
कुल मिला कर सारांश यहाँ है कि यद्यपि भगवान् का निर्माण मनुष्यं ने किया है। पर यह उस असीम शक्ति को सम्मान है जिसका हम हिस्सा हैं। एक बीज को देख कर बरगद के वृक्ष की कल्पना नहीं की जा सकती।पर जानकार जानते हैं उसमे छिपी ताकत और उसके इस्तेमाल को।

एक बात और मैं यहाँ जोड़ना चाहूँगा कि ज्ञान और सोच की यह पद्धति उपनिषद कालीन है जो वेदों मैं कुछ जगह समाहित पाखंडों का प्रबल विरोधी है। याज्ञवलक्य ऋषि इसके प्रमुख प्रणेता हैं। और यही बुद्ध और महावीर के चिंतन का आधार है।

अपनी अल्प ज्ञान के आधार पर जो कुछ सोच पाया वही लिख दिया। आशा है कि अपना पक्ष ठीक से रख पाया होऊंगा।
न मैं था तो खुदा था। न मै होता तो खुदा होता।
मार डाला मुझे होने ने। न मैं होता तो क्या होता।

बहुत गहरी बात कही है ग़ालिब ने।